Tuesday, 6 December 2016

क़ुरआनी दुआएं


رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الآخِرَةِ حَسَنَةً وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ


परवरदिगार हमें दुनिया में भी नेकी अता फ़रनमा और आख़ेरत में भी, और हमें जहन्नम के अज़ाब से महफ़ूज़ फ़रमा। 

बक़रह 201
قَالُواْ رَبَّنَا أَفْرِغْ عَلَيْنَا صَبْرًا وَثَبِّتْ أَقْدَامَنَا وَانصُرْنَا عَلَى الْقَوْمِ الْكَافِرِينَ

पालने वाले हमें बे पनाह सब्र अता फ़रमा,हमारे क़दमों को सिबात दे और हमें काफ़िरों के मुक़ाबिले में नुसरत अता फ़रमा।

बक़रह 250

رَبَّنَا لاَ تُؤَاخِذْنَا إِن نَّسِينَا أَوْ أَخْطَأْنَا 

पालने वाले हम जो भूल जायें या हमसे ग़लती हो जाये उसका मुवाख़ेज़ा न करना। ( यानी उसके बारे में जवाब तलब न करना।)

बक़रह 286v
رَبَّنَا وَلاَ تَحْمِلْ عَلَيْنَا إِصْرًا كَمَا حَمَلْتَهُ عَلَى الَّذِينَ مِن قَبْلِنَا 

पालने वाले हमारे ऊपर वैसा बोझ न डालना, जैसा पिछली उम्मतों पर डाला गया। 

बक़रह 286



رَبَّنَا وَلاَ تُحَمِّلْنَا مَا لاَ طَاقَةَ لَنَا بِهِ وَاعْفُ عَنَّا وَاغْفِرْ لَنَا وَارْحَمْنَآ أَنتَ مَوْلاَنَا فَانصُرْنَا عَلَى الْقَوْمِ الْكَافِرِينَ

पालने वाले हम पर वह बार न डालना जिसकी हम में ताक़त न हो, हमें माफ़ कर देना, हमें बख़्श देना, हम पर रहम करना, तू हमारा मौला और मालिक है, अब काफ़िरों के मुक़ाबिले में हमारी मदद फ़रमा। 

बक़रह 286

رَبَّنَا لاَ تُزِغْ قُلُوبَنَا بَعْدَ إِذْ هَدَيْتَنَا وَهَبْ لَنَا مِن لَدُنْكَ رَحْمَةً إِنّكَ أَنتَ الْوَهَّابُ

पालने वाले हिदायत के बाद हमारे दिलों को न फेरना, हमें अपने पास से रहमत अता फ़रमा, तू तो बेहतरीन अता करने वाला है। 

आलि इमरान 8

رَبَّنَا إِنَّنَا آمَنَّا فَاغْفِرْ لَنَا ذُنُوبَنَا وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ

पालने वाले हम ईमान ले आये हैं हमारे गुनाहों को माफ़ करदे और हमें जहन्नम से बचा ले। 

आलि इमरान 16

ربَّنَا اغْفِرْ لَنَا ذُنُوبَنَا وَإِسْرَافَنَا فِي أَمْرِنَا وَثَبِّتْ أَقْدَامَنَا وانصُرْنَا عَلَى الْقَوْمِ الْكَافِرِينَ

पालने वाले हमारे गुनाहों को माफ़ कर दे हमारे कामों में ज़्यादतियों को माफ़ फ़रमा, हमारे क़दमों को सिबात अता फ़रमा और काफ़िरों के मुक़ाबिले में हमारी मदद फ़रमा। 

आलि इमरान 147

رَبَّنَا فَاغْفِرْ لَنَا ذُنُوبَنَا وَكَفِّرْ عَنَّا سَيِّئَاتِنَا وَتَوَفَّنَا مَعَ الأبْرَارِ

पालने वाले हमारे गुनाहों को माफ़ फ़रमा, हम से हमारी बुराईयों को दूर कर दे और हमें नेक बंदों के साथ महशूर फ़रमा।

आलि इमरान 193

رَبَّنَا آمَنَّا فَاكْتُبْنَا مَعَ الشَّاهِدِينَ

पालने वाले हम ईमान ले आये हैं लिहाज़ा हमारा नाम भी तसदीक़ करने वालों में लिख ले।

मायदा 83

رَبَّنَا لاَ تَجْعَلْنَا مَعَ الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ

पालने वाले हमें ज़ालिमों के साथ क़रार न देना।

आराफ़ 47

رَبَّنَا أَفْرِغْ عَلَيْنَا صَبْرًا وَتَوَفَّنَا مُسْلِمِينَ

पालने वाले हमें बहुत ज़्यादा सब्र अता फ़रमा और हमें मुसलमान दुनिया से उठा। 

आराफ़ 126

رَبَّنَا وَتَقَبَّلْ دُعَاءِ

पालने वाले मेरी दुआ को क़बूल फ़रमा।

इब्राहीम 40

رَبَّنَا اغْفِرْ لِي وَلِوَالِدَيَّ وَلِلْمُؤْمِنِينَ يَوْمَ يَقُومُ الْحِسَابُ

पालने वाले मुझे, मेरे वालदैन को और तमाम मोमेनीन को उस दिन बख़्श देना जिस दिन हिसाब क़ायम होगा। 

इब्राहीम 41

رَبَّنَا آتِنَا مِن لَّدُنكَ رَحْمَةً وَهَيِّئْ لَنَا مِنْ أَمْرِنَا رَشَدًا

पालने वाले हमें अपनी रहमत अता फ़रमा और हमारे काम में कामयाबी का समान फ़राहम कर दे। 

कहफ़ 10

رَبَّنَا آمَنَّا فَاغْفِرْ لَنَا وَارْحَمْنَا وَأَنتَ خَيْرُ الرَّاحِمِينَ

पालने वाले हम ईमान ले आये हैं, अब हमें माफ़ फ़रमा और हमारे ऊपर रहम कर और तू तो रहम करने वालों में सबसे बेहतर है। 

मोमिनून 109

رَبَّنَا هَبْ لَنَا مِنْ أَزْوَاجِنَا وَذُرِّيَّاتِنَا قُرَّةَ أَعْيُنٍ وَاجْعَلْنَا لِلْمُتَّقِينَ إِمَامًا

पालने वाले हमें हमारी अज़वाज व औलाद की तरफ़ से ख़ुनकी –ए- चश्म अता फ़रमा और हमें साहिबाने तक़वा का पेशवा बना दे। 

फ़ुरक़ान 74
ज़कात का नकद फायदा
ज़कात अदा करने से बलायें और मुसीबतें टाल दी जाती हैं। हदीस में है सदका झटपट दिया करो। इसलिए कि मुसीब सदके से आगे नहीं बढ़ती। एक दूसरी हदीस में है बेशक सदका अल्लाह तआला के गुस्से को ठंडा कर देता है। बुरी मौत से बचाता है यानी सख्त बीमारी और संगीन हालत से बचाने में मुफीद है। एक हदीस में ज़कात अदा करके अपने अमवाल की मजबूत हिफाज़त का इन्तिज़ाम करो और सदके के जरिए अपने मरीजों का इलाज करो और दुआबे गिरयादारी के जरिए आसमानों के तूफानों का मुकाबला करो। 
ज़कात देने से मिलती है अल्लाह की रज़ा
ज़कात देने से माल पाक होता है और अल्लाह तआला की रज़ा हासिल होती है। जबकि ज़कात न देने से माल नापाक रहता है और अल्लाह तआला नाराज होता है। कुरआन और हदीस में ज़कात के बड़े फजाइल बयान किए गये हैं। 
सदकतुल फितर के लिए साल गुजरना जरूरी नहीं
जकात हर साहिब ए निसाब पर फर्ज है, जिसके पास साढ़े बावन तौले चांदी या साढ़े सात तौले सोना हो या फिर इनकी कीमत जितना नकद रूपया हो। जकात के लिए साल गुजरना शर्त है, यानी किसी शख्स के पास छह-सात माह से इतना पैसा है कि जिससे वो इतना जेवर खरीद सकता है तो उस पर जकात फर्ज नहीं हुई। हां उस पर सदकतुल फितर वाजिब है। क्योंकि सदकतुल फितर के लिए साल गुजरने शर्त नहीं है। 
ज़कात अदा ना करने पर वअीद
जो लोग सोना चांदी जमा करके रखते हैं और उन को अल्लाह की राह में खर्च नहीं करते सो आप उनको एक बड़े दर्दनाक अज़ाब की खबर सुनी दीजिए। अव्वल उनको दोजख की आग में तपाया जाएगा। फिर उस माल से उन लोगों की पेशानियां और उन की करवट और उन की पुश्तों को दाग दिया जाएगा। और उन से कहा जाएगा यह वो माल है जिस को तुम ने अपने वास्ते जमा करके रखा था। सो अब अपने जमा करने का मज़ा चखो (कुरआन करीम-सूर ए तोबा)।
हदीस: हजरत इब्ने मसऊद फरमाते हैं कि रसूल अकरम सल. ने इरशाद फरमाया कि जो शख्स अपने माल की ज़कात अदा नहीं करता क्यामत के दिन उस का माल गंजे सांप की शक्ल में उसकी गर्दन में डाल दिया जाएगा और वो कहेगा- मैं तेरा माल हूं।

Monday, 5 December 2016

माँ
क़ुरआन में अल्लाह ने माता-पिता के साथ बेहतर व्यवहार करने का आदेश दिया है, 
'तुम्हारे स्वामी ने तुम्हें आदेश दिया है कि उसके सिवा किसी की पूजा न करो और अपने माता-पिता के साथ बेहतरीन व्यवहार करो। यदि उनमें से कोई एक या दोनों बुढ़ापे की उम्र में तुम्हारे पास रहें तो उनसे 'उफ् ' तक न कहो बल्कि उनसे करूणा के शब्द कहो। उनसे दया के साथ पेश आओ और कहो-
'ऐ हमारे पालनहार! उन पर दया कर, जैसे उन्होंने दया के साथ बचपन में मेरी परवरिश की थी।'
                                                                                             (क़ुरआन, 17:23-24)

इस्लाम ने मां का स्थान पिता से भी ऊँचा करार दिया। ईशदूत हजरत मुहम्मद (सल्ल.) ने कहा- 
'यदि तुम्हारे माता और पिता तुम्हें एक साथ पुकारें तो पहले मां की पुकार का जवाब दो।' 
एक बार एक व्यक्ति ने हजरत मुहम्मद (सल्ल.) से पूछा
'हे ईशदूत, मुझ पर सबसे ज्यादा अधिकार किस का है?' 
उन्होंने जवाब दिया 'तुम्हारी माँ का', 
'फिर किस का?' उत्तर मिला 'तुम्हारी माँ का',
 'फिर किस का?' फिर उत्तर मिला 'तुम्हारी माँ का' 
तब उस व्यक्ति ने चौथी बार फिर पूछा 'फिर किस का?' 
उत्तर मिला 'तुम्हारे पिता का।'
संपत्ति में अधिकार-औरत को बेटी के रूप में पिता की जायदाद और बीवी के रूप में पति की जायदाद का हिस्सेदार बनाया गया। यानी उसे साढ़े चौदह सौ साल पहले ही संपत्ति में अधिकार दे दिया गया।
पत्नी
वर चुनने का अधिकार : इस्लाम ने स्त्री को यह अधिकार दिया है कि वह किसी के विवाह प्रस्ताव को स्वेच्छा से स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है। इस्लामी कानून के अनुसार किसी स्त्री का विवाह उसकी स्वीकृति के बिना या उसकी मर्जी के विरुद्ध नहीं किया जा सकता।
बीवी के रूप में भी इस्लाम औरत को इज्जत और अच्छा ओहदा देता है। कोई पुरुष कितना अच्छा है, इसका मापदण्ड इस्लाम ने उसकी पत्नी को बना दिया है। इस्लाम कहता है अच्छा पुरुष वही है जो  अपनी पत्नी के लिए अच्छा है। यानी इंसान के अच्छे होने का मापदण्ड उसकी हमसफर है। 
पैगम्बर मुहम्मद सल्ल. ने फरमाया-
तुम में से सर्वश्रेष्ठ इंसान वह है जो अपनी बीवी के  लिए सबसे अच्छा है। (तिरमिजी, अहमद)
शायद आपको ताज्जुब हो लेकिन सच्चाई है कि इस्लाम अपने बीवी बच्चों पर खर्च करने को भी पुण्य का काम मानता है।
 पैगम्बर मुहम्मद सल्ल. ने फरमाया-
तुम अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए जो भी खर्च करोगे उस पर तुम्हें सवाब (पुण्य) मिलेगा, यहां तक कि उस पर भी जो तुम अपनी बीवी को खिलाते पिलाते हो। (बुखारी,मुस्लिम)।
पैगम्बर मुहम्मद सल्ल. ने कहा-
आदमी अगर अपनी बीवी को कुएं से पानी पिला देता है, तो उसे उस पर बदला और सवाब (पुण्य) दिया जाता है। (अहमद)
मुहम्मद सल्ल. ने फरमाया-
महिलाओं के साथ भलाई करने की मेरी वसीयत का ध्यान रखो। (बुखारी, मुस्लिम)
बेटी
इस्लाम के पैगम्बर मुहम्मद सल्ल. ने फरमाया-
बेटी होने पर जो कोई उसे जिंदा नहीं गाड़ेगा (यानी जीने का अधिकार देगा), उसे अपमानित नहीं करेगा और अपने बेटे को बेटी पर तरजीह नहीं देगा तो अल्लाह ऐसे शख्स को जन्नत में जगह देगा।
                                                    (इब्ने हंबल)
अन्तिम ईशदूत हजऱत मुहम्मद सल्ल. ने कहा-
'जो कोई दो बेटियों को प्रेम और न्याय के साथ पाले, यहां तक कि वे बालिग हो जाएं तो वह व्यक्ति मेरे साथ स्वर्ग में इस प्रकार रहेगा (आप ने अपनी दो अंगुलियों को मिलाकर बताया)।
मुहम्मद सल्ल. ने फरमाया-
जिसके तीन बेटियां या तीन बहनें हों या दो बेटियां या दो बहनें हों और वह उनकी अच्छी परवरिश और देखभाल करे और उनके मामले में अल्लाह से डरे तो उस शख्स के लिए जन्नत है। (तिरमिजी)

इस्लाम में औरत का मुकाम: एक झलक

विश्व महिला दिवस
इस्लाम को लेकर यह गलतफहमी है और फैलाई जाती है कि इस्लाम में औरत को कमतर समझा जाता है। सच्चाई इसके उलट है। हम इस्लाम का अध्ययन करें तो पता चलता है कि इस्लाम ने महिला को चौदह सौ  साल पहले वह मुकाम दिया है जो आज के कानून दां भी उसे नहीं दे पाए।
इस्लाम में औरत के मुकाम की एक झलक देखिए।

जीने का अधिकार
शायद आपको हैरत हो कि इस्लाम ने साढ़े चौदह सौ साल पहले स्त्री को दुनिया में आने के साथ ही अधिकारों की शुरुआत कर दी और उसे जीने का अधिकार दिया। यकीन ना हो तो देखिए कुरआन की यह आयत-
          'और जब जिन्दा गाड़ी गई लड़की से पूछा जाएगा, बता तू किस अपराध के कारण मार दी गई?"                                                                                     (कुरआन, 81:8-9) 
यही नहीं कुरआन ने उन माता-पिता को भी डांटा जो बेटी के पैदा होने पर अप्रसन्नता व्यक्त करते हैं-
       'और जब इनमें से किसी को बेटी की पैदाइश का समाचार सुनाया जाता है तो उसका चेहरा स्याह पड़ जाता है और वह दु:खी हो उठता है। इस 'बुरी' खबर के कारण वह लोगों से अपना मुँह छिपाता फिरता है। (सोचता है) वह इसे अपमान सहने के लिए जिन्दा रखे या फिर जीवित दफ्न कर दे? कैसे बुरे फैसले हैं जो ये लोग करते हैं।'
                                                  (कुरआन, 16:58-59)

Saturday, 3 December 2016

हिन्दुस्तान के राजा दशरथ के कर्इ पतिनयां थी। इसी तरह कृष्णाजी को भी हम रूक्मिणी, सत्यबा और राधा के अलावा असंख्य गोपियों के बीच देखते हैं। 

बल्ली औरतों के साथ मरगन जैसे देवता को हम ऐश करते हुए पाते हैं। 

यह तो थी प्राचीन काल और पुराणों की बात, अब ऐतिहासिक घटनाओं को लीजिए। 

बड़े-बड़े राजाओं के यहॉ एक से अधिक पत्नियॉ होती थी। तमिलनाडू के कटटा बम्मन के घर कर्इ पत्नियां थी।


आज भी कुछ राजनैतिक नेता कर्इ पत्नियां रखते हैं।

इस्लाम से पहले अरब मे पत्नियों की संख्या पर कोर्इ हदबन्दी नही थी। प्यारे नबी ने मर्द के स्वभाव और अमली जरूरतों का ध्यान रख कर इस असीम संख्या को चार तक सीमित रखा।

इस्लाम से पहले अरब दुनिया में शादी विवाह का कोर्इ विशेष नियम और सिद्धान्त न था। गिरोहो और कबीलों के बीच पत्नियॉ और दासियां रखने जब चाहा तलाक दे दी, इन हालात के सुधार के लिए खुदा के निर्देश आये, पत्नियों की संख्या को सीमित कर दिया गया और तलाक के सम्बन्ध में उचित नियमों और शिष्टाचार की पाबन्दी का हुक्म दियागया कुरआन में फरमाया गया।

‘‘ तुम्हे अगर आशंका हो कि यतीम बच्चो की परवरिश बगैर शादी किये न हो सकेगी तो अपनी पसन्द की दो, तीन या चार औरतों से तुम विवाह कर सकते हो (यह आशंका हो कि उनके साथ भी तुम न्याय न कर पाओगे तो) और औरत या दासी ही पर बस करो, अन्याय से बचने के लिए यह आसान तरीका हैं।            (निसा 6)

क्ुरआन की इस हिदायत मे जो हिकमते और भलार्इयां हैं उन पर भी विचार कीजिए। न्याय, इंसाफ तथा सच्चार्इ के साथ पत्नी से पेश आओ। बहुस्त्रीवाद की अनुमति भी हैं और इसी के साथ-साथ नाइंसाफी से बचने की ताकीद भी। न्याय और इन्साफ सम्भव न हो तो एक ही शादी पर जोर दिया गया हैं। 

मर्द को किसी भी समय अपनी काम तृष्णा की जरूरत पेश आ सकती हैं। इसलिए कि उसे कुदरत ने हर हाल मे हमेशा सहवास के योग्य बनाया हैं जबकि औरतों का मामला इससे भिन्न हैं।

माहवारी के दिनो मे, गर्भावस्था में (नौ-दस माह) प्रसव के बाद के कुछ माह औरत इस योग्य नही होती  कि उसके साथ उसका पति सम्भोग कर सके।

सारे ही मर्दो से यह आशा रखना सही न होगा कि वे बहुत ही संयम और नियन्त्रण से काम लेंगे और जब तक उन की पत्नियां इस योग्य नही हो जाती कि वे उनके पास जायें, वे काम इच्छा को नियंत्रित रखेंगे। मर्द जायज तरीके से अपनी जरूरत पूरी कर सके, जरूरी है कि इसके लिए राहे खोली जायें और ऐसी तंगी न रखी जाय कि वह हराम रास्तों पर चलने पर विवश हों। पत्नी तो उसकी एक ही हो, आशना औरतों की कोर्इ कैद न रहे। इससे समाज मे जो गन्दगी फैलेगी और जिस तरह आचरण और चरित्र खराब होंगे  इसका अनुमान लगाना आपके लिए कुछ मुश्किल नही हैं। 

व्यभिचार और बदकारी को हराम ठहराकर बहुस्त्रीवाद की कानूनी इजाजत देने वाला बुद्धिसंगत दीन इस्लाम हैं। 

एक से अधिक शादियों क मर्यादित रूप में अनुमति देकर वास्तव में इस्लाम ने मर्द और औरत की शारीरिक संरचना, उनकी मानसिक स्थितियों और व्यावहारिक आवश्यकताओं का पूरा ध्यान रखा हैं और इस तरह हमारी दृष्टि में इस्लाम बिल्कुल एक वैज्ञानिक धर्म साबित होता हैं। यह एक हकीकत है, जिसपर मेरा दृढ़ और अटल विश्वास हैं। 


From Islam sabke liye.
इतने अधिकार प्रदान करके औरत को बिल्कुल आजाद भी नही छोड़ा, बल्कि उसे कुछ बातों का पाबन्द भी किया: 

1-औरत इस तरह रहे कि जब उसका पति उसे देखे तो खुश हो जाय। जब कोर्इ हुक्म दे तो उसे पूरा करें। पति अगर दूर हो तो उसकी सम्पत्ति और अपने सतीत्व की सुरक्षा करें। ऐसी ही स्त्री आदर्श पत्नी समझी जायेगी।

2-सुशीला पत्नी का मिल जाना अमूल्य पूंजी के बराबर हैं।
3-जो पांचो समय की रोजाना नमाज पढ़े, रमजान के रोजे रखे और अपने पति का कहा माने तथा अपने सतीत्व की सुरक्षा करें, ऐसी औरत जिस रास्ते से चाहे जन्नत में प्रवेश  करें।

4-दुनिया की सारी दौलत से ज्यादा कीमती चीज पाक दामन बीबी हैं। 
इस तरह प्यारे नबी स0 ने औरतों को अधिकार भी दिये और उन्हे उनके कर्तव्यो से भी बाखबर किया।
किसी को आपत्ति हो सकती हैं कि औरतों को इतने सारे अधिकार प्रदान करने वाले इस्लाम में बहुपत्नीवाद की अनुमति क्यों हैं? क्या यह औरतों पर खुला जुल्म नहीं हैं। इस सिलसिले में हमे इतिहास, पुरूष के स्वभाव और जिन्दगी के व्यावहारिक मसलों को सामने रखना होगा।

इस्लाम से पहले आमतौर से हर समाज और हर सोसाइटी में औरत को हीन समझा था। उसका अपमान किया जाता और तरह-तरह के अत्याचारों का उसे निशाना बनाया जाता था।

•    भारतीय समाज में पति के मर जाने पर पति की लाश के साथ पत्नी को भी जिन्दा जल जाना पड़ता था।
•    चीन में औरत के पैर में लोहे के तंग जूते पहनाए जाते थें।
•    अरब में लड़कियों को जीवित गाड़ दिया जाता था। 
इतिहास गवाह हैं कि इन अत्याचारों के विरूद्ध आवाज उठाने वाले सुधारक निकटवर्ती युग में पैदा हुए हैं, लेकिन इन सभी सुधारकों से शताब्दियों पहले अरब देश में प्यारे नबी सल्ल0 औरतों के हितैषी के रूप में नजर आते हैं और औरतों पर ढाये जाने वाले अत्याचारों का खात्मा कर देते हैं। 

औरत के अधिकारों से अनभिज्ञ, अरब समाज मे प्यारे नबी सल्ल0 ने औरत को मर्द के बराबर दर्जा दिया। औरत का जायदाद और सम्पत्ति मे कोर्इ हक न था, आप स0 ने विरासत मे उसका हक नियत किया। औरत के हक और अधिकार बताने के लिए कुरआन मे निर्देश उतारे गये।

मॉ-बाप और अन्य रिश्तेदारों की जायदाद में औरतों को भी वारिस घोषित किया गया। आज सभ्यता का राग अलापने वाले कर्इ देशों में औरत को न जायदाद का हक हैं न वोट देने का। इंग्लिस्तान में औरत को वोट का अधिकार 1928 र्इ0 पहली बार दिया गया। भारतीय समाज मे औरत को जायदाद का हक पिछले दिनों में हासिल हुआ। 

लेकिन हम देखते हैं कि आज से चौदह सौं वर्ष पूर्व ही ये सारे हक और अधिकार नबी स0 ने औरतों को प्रदान किये। कितने बड़े उपकार कर्ता हैं आप!

आप स0 की शिक्षाओं में औरतों के हक पर काफी जोर दिया गया हैं। आप स0 ने ताकीद की लोग इस कर्तव्य से गाफिल न हो और न्यायसंगत रूप से औरत को मारा-पीटा न जाय।

औरत के साथ कैसा बर्ताव किया जाय, इस सम्बन्ध मे नबी स0 की बातों का अवलोकन कीजिए: 

(1) अपनी पत्नी को मारने वाला अच्छे आचरण का नही हैं। 
(2) तुममें से सर्वश्रेष्ट व्यक्ति वह हैं जो अपनी पत्नी से अच्छी सूलूक करे।
(3) औरतों के साथ अच्छे तरीके से पेश आपे का खुदा हुक्म देता हैं, क्योकि वे तुम्हारी मॉ, बहिन और बेटियॉ हैं। 
(4) मां के कदमों के नीचे जन्नत हैं।
(5) कोर्इ मुसलमान अपनी पत्नी से नफरत न करें। अगर उसकी कोर्इ एक आदत बुरी हैं तो उसकी दूसरी अच्छी आदत को देख कर मर्द को खुश होना चाहिए।
    
(6) अपनी पत्नी के साथ दासी जैसा व्यवहार न करो। उसको मारो भी मत। 

(7) जब तुम खाओं तो अपनी पत्नी को भी खिलाओं । जब तुम पहनो तो अपनी पत्नी को भी पहनाओं 

(8) पत्नी को ताने मत दों। चेहरे पर न मारो। उसका दिल न दुखाओं। उसकी छोड़कर न चले जाओं।
(9) पत्नी अपने पति के स्थान पर समस्त अधिकारों की मालिक हैं। 
(10) अपनी पत्नियों के साथ जो अच्छी तरह बर्ताव करेंगे, वही तुम में सबसे बेहतर हैं।
"The main reason Muslims are growing not only in number but in share worldwide is because of where they live," Alan Cooperman, Pew's director of religion research, tells NPR's Tom Gjelten. "Muslim populations are concentrated in some of the fastest-growing parts of the world."
The finding is part of the center's report on the future of the world's religions. You can see the full report at the Pew site, which has also published an interactive tool to help readers drill down by geography and religion.
"As of 2010, Christianity was by far the world's largest religion, with an estimated 2.2 billion adherents, nearly a third (31 percent) of all 6.9 billion people on Earth," the Pew report says. "Islam was second, with 1.6 billion adherents, or 23 percent of the global population."
Those numbers are predicted to shift in the coming decades, as the world's population rises to 9.3 billion by the middle of this century. In that time, Pew projects, Islam will grow by 73 percent while Christianity will grow by 35 percent — resulting in 2.8 billion Muslims and 2.9 billion Christians worldwide.
Islam is growing more rapidly than any other religion in the world, according to a new report by the Pew Research Center that says the religion will nearly equal Christianity by 2050 before eclipsing it around 2070, if current trends continue.

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